आखिर ऐसा क्या है जो पाकिस्तान इस हरे सोने के पीछे पड़ा है…

आखिर ऐसा क्या है जो पाकिस्तान इस हरे सोने के पीछे पड़ा है…

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद जहांगीर और उनके परिवार की आय का मुख्य स्रोत भांग की फ़सल से मिलने वाली चरस की ग़ैर क़ानूनी बिक्री है, जिससे वे पांच से छह लाख रुपए सालाना कमा लेते हैं. हालांकि पिछले कई सालों से इस फ़सल से होने वाली उनकी आय अब आधी रह गई है, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान से होने वाली तस्करी के कारण दाम में कमी आई है.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के तीन ज़िलों यानी ख़ैबर की वादी तीराह, औरकज़ई और कुर्रम के ख़ास इलाक़ों में भांग की खेती की जाती है. इससे बनने वाली चरस की तस्करी न सिर्फ़ देश के अंदर बल्कि विदेशों में भी होती है.

दूसरे देशों में भांग के अवयवों से भोजन, कपड़े, दवाइयां और निर्माण सामग्रियां बनती हैं, जो भांग से बनने वाली चरस की अपेक्षा बहुत अधिक आय देती हैं.इस आधार पर ख़ैबर पख़्तूनख़्वा सरकार ने सन 2021 में ज़िला ख़ैबर की वादी तीराह, औरकज़ई और कुर्रम में भांग की क़ानूनी खेती और इससे चरस व अन्य मादक पदार्थ बनाने के बदले उसके लाभकारी इस्तेमाल के उद्देश्य से सर्वे कराने का निर्णय किया था जिसकी ज़िम्मेदारी पेशावर विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग को दी गयी थी.

फार्मेसी विभाग से संबद्ध प्रोफेसर फ़ज़ल नासिर उस योजना के संरक्षक थे. बीबीसी को उन्होंने बताया कि जून 2021 से तीन ज़िलों में भांग से संबंधित सर्वे शुरू हुआ और आधुनिक प्रणाली और प्रौद्योगिकी को प्रयोग में लाते हुए छह महीने की अल्प अवधि में कुल क्षेत्रफल पर भांग की खेती और चरस की सालाना उपज से संबंधित जानकारी एकत्रित कर दिसंबर 2021 में ख़ैबर पख़्तूनख़्वा इकोनॉमिक ज़ोन के पास जमा किया गया है.

उन्होंने बताया कि इस शोध कार्य पर एक करोड़ 43 लाख रुपये खर्च हुए हैं. जिन क्षेत्रों में सर्वे हुआ था वहां से संबंध रखने वाले किसान आशान्वित थे कि राज्य सरकार चालू साल में भांग की खेती के लिए सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी कार्रवाई पूरी कर लेगी लेकिन यह योजना विलंब का शिकार हो गयी.

सर्वे रिपोर्ट से क्या पता चला?

सर्वे रिपोर्ट में सरकार को प्रस्ताव दिया गया है कि चरस से ‘सीबीडी’ तेल निकालने और भांग के तने से विभिन्न सामान तैयार करने के लिए भांग की खेती वाले तीन ज़िलों में छह कारख़ाने लगाये जाएं जिससे छह हज़ार लोगों को सीधे काम के अवसर मिलेंगे.

खुले बाज़ार में ‘सीबीडी’ तेल का प्रति लीटर मूल्य 1250 से 1500 अमेरिकी डालर है जबकि साढ़े तीन किलो चरस से एक लीटर तेल निकलता है. ‘सीबीडी’ तेल के अच्छे मूल्य के कारण इसे ‘हरा सोना’ भी कहा जाता है.

रिपोर्ट में भांग के बीज में आधारभूत परिवर्तन लाने का प्रस्ताव दिया गया है क्योंकि वर्तमान फ़सल में नशे का भाग यानी ‘एचटीसी’ की मात्रा 43 प्रतिशत है, जो बहुत अधिक है.अभी के बीज से पैदा होने वाले भांग के पौधे की लंबाई नौ से दस फीट होती है, जबकि प्रस्तावित बीज के पौधों की लंबाई पंद्रह से सोलह फीट होगी.

राज्य सरकार ने भांग से बनने वाली दवाइयों के इस्तेमाल और इस पर शोध कार्यों की ज़िम्मेदारी पेशावर यूनिवर्सिटी के फार्मेसी विभाग और मार्केटिंग व बिज़नेज प्लान से संबंधित ज़िम्मेदारी मैनेजमेंट स्टडीज़ को दी थी. इसी तरह मशीन लगाये जाने से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए पर्यावरण विभाग, भौगोलिक जानकारी के लिए भूगर्भ शास्त्र, वैधानिक स्थिति की समीक्षा की ज़िम्मेदारी लॉ कॉलेज और लोगों में सामाजिक जागरुकता लाने की ज़िम्मेदारी समाज शास्त्र विभाग के हवाले की गयी थी.

योजना की प्रगति कैसी है?

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा इकोनॉमिक ज़ोन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जावेद इक़बाल ख़टक के अनुसार भांग से संबंधित प्रारंभिक रिपोर्ट को स्माॅल इंडस्ट्री डेवलपमेंट बोर्ड और प्लानिंग ऐंड डेवलपमेंट को विचार-विमर्श के लिए भेज दिया गया है.

उन्होंने कहा कि उन संस्थाओं और इकोनॉमिक ज़ोन के प्रस्तावों की अंतिम रिपोर्ट न सिर्फ संस्थान की वेबसाइट पर उपलब्ध होगी बल्कि इस क्षेत्र में निवेश और आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए व्यावहारिक पहल भी की जाएगी.

ख़ैबर, औरकज़ई और कुर्रम में भांग की क़ानूनी खेती में देरी के बारे में राज्य सरकार के प्रवक्ता बैरिस्टर सैफ़ से संपर्क किया गया मगर उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला हालांकि राज्य के उच्च पदस्थ अधिकारी ने बताया कि भांग की क़ानूनी खेती में देरी का एक कारण राष्ट्रीय भांग नीति की स्वीकृति में आने वाली अड़चनें हैं.

उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर शोध का काम संपन्न हो चुका है हालांकि इस बारे में संबंधित संस्थाओं के साथ विचार विमर्श का काम जारी है जिसके जल्द पूरा होने के बाद भांग की खेती क़ानूनी तरीक़े से शुरू हो जाएगी.

भांग की खेती के आंकड़े

ख़ैबर, औरकज़ई और कुर्रम में भांग की वर्तमान खेती से संबंधित किसी भी सरकारी संस्था के पास संपुष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं है लेकिन प्रोफेसर फ़ज़ल नासिर ने दावा किया कि आधुनिक टेक्नोलॉजी और स्थानीय बाज़ार के आंकड़े के अनुसार तीनों ज़िलों में दो सौ वर्ग किलोमीटर यानी 49 हज़ार एकड़ ज़मीन पर भांग की खेती की जाती है जिससे वार्षिक पचास लाख किलोग्राम तक चरस प्राप्त होती है.

क्षेत्रफल के हिसाब से औरकज़ई पहले, तीराह दूसरे जबकि कुर्रम तीसरे नंबर पर है, हालांकि सबसे अच्छी फ़सल तीराह में पैदा होती है। उन्होंने कहा कि आधे एकड़ खेत से तीराह में पांच किलो, औरकज़ई में साढ़े तीन किलोग्राम और कुर्रम में दो से ढाई किलो तक चरस हासिल की जा सकती है.

चरस की कीमत कम क्यों हो गयी

तीराह की घाटी के 70 वर्षीय हाजी करीम ने चालू साल में फ़सल के लिए खेतों को पहले से तैयार कर दिया है लेकिन समय पर वर्षा नहीं होेने के कारण अब तक उन्होंने भांग की फ़सल नहीं लगायी है.

उनका कहना है कि दो एकड़ कृषि भूमि से पंद्रह लाख वार्षिक आय होती थी लेकिन बाज़ार में चरस की क़ीमत साठ हज़ार रुपये प्रति किलो से कम होकर 12 हज़ार तक गिरने के कारण ख़र्च भी मुश्किल से निकल पाता है.

उनके अनुसार स्थानीय लोगों के पास भांग की खेती के अलावा कोई और वैकल्पिक स्रोत नहीं हालांकि सरकार की ओर से कहा गया है कि क्षेत्र में भांग की क़ानूनी खेती की अनुमति मिलने के बाद लोगों की आय बढ़ेगी लेकिन अब तक इस बारे में कुछ भी पता नहीं है.

इस क्षेत्र से संबंध रखने वाले शेर खान- काल्पनिक नाम- चरस की ग़ैर क़ानूनी बिक्री के धंधे से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि मई 2018 में क़बीलाई इलाक़ों के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में विलय के बाद विभिन्न संस्थाओं और क़ानूनों के विस्तार के कारण चरस का कारोबार जारी रखने में काफी कठिनाई उत्पन्न हो गयी है, क्योंकि दूसरे इलाक़ों तक भेजने में परेशानी और ख़र्च बढ़ चुके हैं.

उन्होंने कहा कि पिछले कई सालों से बलूचिस्तान के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान से चरस की भारी मात्रा में तस्करी की वजह से चरस की क़ीमत सत्तर हज़ार रुपये प्रति किलो से कम होकर दस से बारह हज़ार रुपये किलो तक गिर चुकी है जिसके कारण पाकिस्तान में भांग की फसल पर आने वाली लागत भी मुश्किल से मिल पा रही है.

‘जब भांग की खेती क़ानूनी होगी तो किसान को लाभ होगा’

भविष्य में ख़ैबर, औरकज़ई और कुर्रम में भांग की क़ानूनी खेती के बारे में अगर एक तरफ स्थानीय लोग सरकार के इस क़दम से बेहतर आर्थिक भविष्य की आशा रखते हैं तो दूसरी तरफ लोग इसके बारे में कई सवाल उठा रहे हैं.आबाद गुल औरकज़ई फ़ीरोज़ख़ेल मेले के निवासी हैं और छह एकड़ खेत में भांग की खेती करते हैं. अपने खेत में भांग की उपज के अलावा वे हर साल 8 से 10 लाख रुपये मूल्य की भांग स्थानीय किसानों से भी ख़रीदते हैं.

उन्होंने कहा कि कारख़ाने लगाने, भांग से प्राप्त सामग्री की मार्केटिंग और अन्य योजनाओं में स्थानीय किसानों और पूंजी लगाने वालों को अवसर उपलब्ध कराया जाए क्योंकि इन इलाक़ों में भांग के अलावा कमाई का कोई दूसरा साधन नहीं.

प्रोफेसर फ़ज़ल नासिर ने कहा कि उन्होंने स्थानीय आबादी की आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक लाभ स्थानीय लोगों को देने की पहल पर ज़ोर दिया है और सरकार को प्रस्ताव दिया है कि प्रस्तावित पहलों से होने वाले आर्थिक लाभ में बड़ा भाग स्थानीय आबादी का होना चाहिए.उन्होंने कहा कि एक कारख़ाने पर लगभग छह से आठ करोड़ की लागत आएगी जबकि निजी क्षेत्र में स्थानीय निवेशक छोटे कारख़ाने एक से डेढ़ करोड़ रुपये में लगा सकते हैं.जावेद इक़बाल ख़टक ने बताया कि भांग से प्राप्त होने वाली रासायनिक सामग्री के लिए सिर्फ स्थानीय बाज़ार ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मार्केट तक पहुंच के लिए ज़िला ख़ैबर में एक हज़ार एकड़ ज़मीन पर ख़ैबर इकोनॉमिक कारिडोर स्थापित करने के लिए सभी प्रबंध किये जा चुके हैं.

इनमें पहला काम भांग के छोटे और मध्यम दर्जे के कारख़ाने स्थापित करना, रास्तों में आने वाली बाधाओं की स्थिति में अफ़ग़ानिस्तान जाने वाली गाड़ियों के लिए टर्मिनल और ताज़ा सब्ज़ी और मेवों को ले जाने वाले कोल्ड स्टोरेज कन्टेनर को रिचार्ज करने की सुविधा मिल सकेगी.उन्होंने कहा कि जब भांग से क़ानून के अनुसार सामग्री प्राप्त करने का सिलसिला शुरू होगा तो किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा जबकि तीराह, औरकज़ई और कुर्रम में भी छोटी यूनिट की स्थापना को बढ़ावा दिया जाएगा.

भांग की क़ानूनी खेती और आमदनी

नेशनल एसेंबली की सायंस एवं टेक्नोलॉजी समिति ने पिछले साल अक्टूबर में निर्णय किया था कि साल के अंत में राष्ट्रीय भांग नीति स्वीकृत हो जाएगी लेकिन अब तक इसमें कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी है.पाकिस्तान काउन्सिल आफ सायंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिचर्स के सदस्य डॉ. नसीम रउफ ने इस संबंध में बताया कि कैनाबीज या भांग का दुनिया भर में दवाओं के लिए इस्तेमाल होता है और दर्द निवारक तेल ‘सीडीबी’ इससे बनाया जाता है जिसका एक लीटर 10 हज़ार डाॅलर तक में बिकता है.

इसके अलावा कपड़े की तैयारी में भी इसका बहुत महत्व है. उनका कहना है कि दुनिया में इस पौधे से जुड़ा व्यापार 29 अरब डाॅलर तक पहुंच चुका है और 2025 तक इसके व्यापार का संभावित आकार 95 अरब डॉलर तक होगा.उनके बक़ौल पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने जून 2020 में भांग की खेती के आर्थिक लाभ को ध्यान में रखते हुए सरकार को क़दम उठाने का निर्देश दिया था जिसपर सितंबर 2020 में कैबिनेट की स्वीकृति के बाद पीसी वन तैयार किया गया.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के साथ विलय होने वाले ज़िलों में भांग के साथ पोस्त की फ़सल को भी शोध योजना में शामिल किया गया था लेकिन जब योजना पर काम शुरू हुआ तो उस वक्त उस फ़सल का समय बीत चुका था.इस संबंध में भांग पर शोध के लिए बनी टीम राज्य सरकार के फैसले की प्रतीक्षा कर रही थी लेकिन देर होने के कारण फ़सल का समय इस साल भी समाप्त हो गया है.

पाकिस्तान में भांग की क़ानूनी खेती का इतिहास

पाकिस्तान में भांग की क़ानूनी खेती के लिए पहली नीति 1950 में बनायी गयी थी जिसके तहत पंजाब के ज़िले बहावलपुर में पहली खेती हुई थी हालांकि यह योजना विफल हो गयी क्योंकि उस क्षेत्र की जलवायु गर्म थी.

सरकार ने हज़ारा डिविज़न के ठंडे क्षेत्र में भांग की खेती के सफल प्रयोग किये लेकिन बाद में उन योजनाओं पर कोई विशेष काम नहीं हुआ.ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों में भी भांग की ग़ैर क़ाननी खेती होती थी और अब लंबे अर्से से तीराह, औरकज़ई और कुर्रम में भांग उपजायी जाती है.

भांग से चरस कैसे प्राप्त होती है

मई के शुरू में तीराह, औरकज़ई और कुर्रम में भांग की विधिवत खेती शुरू होकर दो तीन सप्ताहों में यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है। पौधों की लंबाई ढाई फीट होने के बाद उसमें गोड़ाई करके जड़ी बूटियां निकाल ली जाती हैं और साथ में पौधों की संख्या भी कम कर ली जाती है.स्थानीय किसान पिछले साल की फ़सल से प्राप्त बीज बोते हैं. मई और जून के महीने में कृत्रिम खाद के इस्तेमाल से नर पौधे भी निकाल लिये जाते हैं ताकि फ़सल की पैदावार बेहतर हो सके.

फ़सल की कटाई अक्टूबर के अंत में होती है और पौधों को छोटे आकार में बांध लेने के बाद उनको खेत में ही छोड़ दिया जाता है ताकि उन पर बारिश और बर्फ़बारी पड़े क्योंकि इस प्रक्रिया से प्राप्त होने वाली चरस का स्तर बेहतर हो जाता है.पहली बारिश या बर्फ़बारी के बाद भांग को सुरक्षित स्थान पर रखकर दिसंबर- जनवरी के शुरुआत में फ़सल से चरस प्राप्त करने का काम शुरू हो जाता है जो फरवरी या मार्च तक जारी रहता है.

युवा वैकल्पिक रोज़गार की तलाश में

तीराह घाटी में कुछ युवा ऐसे रोज़गार की तलाश में हैं जो कम लागत और अधिक आमदनी के साथ क़ानूनी हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए न्यूक्लियर इंस्टीट्यूट फॉर फूड ऐंड एग्रीकल्चर- एनआईएफए- की तकनीकी मदद से जनवरी 2021 में मशरूम की खेती के बारे में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी थी जिसमें 30 से अधिक स्थानीय किसानों ने भाग लिया। इनमें तीस साल के फ़ज़ल रब्बी भी शामिल थे जिन्होंने ट्रेनिंग लेने के बाद अपने घर पर मशरूम की खेती की.

इसके साथ उस क्षेत्र में मशरूम की पैदावार बढ़ाने के लिए उन्होंने तीराह में मशरूम क्लब के नाम से एक संगठन बनाया जिसमें घाटी के सत्तर से अधिक किसान सदस्य हैं.फ़ज़ल रब्बी का कहना है कि पहले की तुलना में कृषि भूमि से प्राप्त होने वाली भांग की फ़सल की क़ीमत कम होने की वहज से इलाक़़े के नौजवान बड़ी संख्या में नये रास्तों की तलाश में थे.

और फिर स्थानीय सैन्य अफसरों की सहायता से मशरूम की खेती की ट्रेनिंग की व्यवस्था की. उनके बक़ौल युवाओं ने इसी आधार पर मशरूम की खेती शुरू की जिसके काफी अच्छे नतीजे सामने आने शुरू हुए जिसके कारण लोगों की इसमें रुचि बढ़ गयी.मशरूम क्लब की ओर से और किसानों को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दिया गया और यह सिलसिला अब भी जारी है.

कृषि विभाग, ख़ैबर के निदेशक ज़िया इस्लाम दावड़ ने बताया कि जिन इलाक़ो में भांग की खेती होती है वहां पर ज़बर्दस्ती खेती बंद नहीं कर रहे हैं बल्कि संस्थान और सैन्य अफसरों की सहायता से इलाक़े में ऐसी सब्ज़ियां, फ़सलें और बाग़ लगाये जा रहे हैं जिनसे आमदनी भांग की तुलना में अधिक हो.

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नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल)

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. timepass अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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